October 25, 2020
"ब्राह्मणवाद" के नाम पर मिथ्याप्रचार: भाग-2

“ब्राह्मणवाद” के नाम पर मिथ्याप्रचार: भाग-2

मित्रों,

यदि मैं कहूं कि संम्पूर्ण भारतीय सभ्यता की अवधि में (पूर्व-वैदिक और उत्तर-वैदिक काल से आज तक) पहला संगठित “जातीय” अत्याचार ब्राह्मणों पर हुआ था तो क्या आप विश्वास करेंगे? और यदि यह कहूं यह अत्याचार “शूद्रों” ने किया था तब तो “शूद्र” इसे ब्राह्मणों का एक और झूठ कहेंगे और स्वयं ब्राह्मण भी इस पर विश्वास नहीं करेंगे। परन्तु यह दोनों बातें सच हैं।

इससे भी बड़ा आश्चर्य और अविश्वास आपको यह जानकर होगा कि यह बात मैं (सरस त्रिपाठी) या कोई “ब्राह्मणवादी” नहीं कह रहा है, यह डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “Who were the Sudras?” (“शूद्र कौन थे?”) में लिखा है। आज जो लोग ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों द्वारा किए गए अत्याचार की बात करते हैं उन्हें भारतीय इतिहास की कोई जानकारी नहीं है। यह बात मैं पूरे दावे के साथ कह रहा हूं।

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इसके पहले कि मैं और आगे बढ़ू, मैं यहां पर अंग्रेजी में लिखी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पुस्तक “Who were Shudras?” से यहां उद्धृत कर रहा हूं। इसका अनुवाद भी मैं नीचे दे रहा हूं (यह पुस्तक मेरे पास है और उसी से पढ़कर उद्धृत कर रहा हूं)। ईसाइयों, अंग्रेजों और स्वघोषित “दलितों” द्वारा फैलाए गए झूठ को समझने में इससे बहुत सहायता मिलेगी। डॉक्टर अंबेडकर पृष्ठ 4-5 पर लिखते हैं:

“What is it that is noteworthy about this book? Undoubtedly, the conclusions, which I have reached as a result of my investigations. Two questions are raised in this book: one who were the Shudras and two, how they came to be the fourth Varna in the Indo-Aryan Society? My answer to them is summarized below:

  1. The Shudras were one of the Aryan communities of Solar race.
  2. There was a time when the Aryan society recognized only three Varnas namely; Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas.
  3. The Shudras did not form a separate Varna. They ranked as part of Kshatriyas in Indo-Aryan Society.
  4. There was a continuous feud between the Shudras’ king and the brahmins in which Brahmins were subjected to many tyrannies and indignities.
  5. As a result of the hatred towards the Shudras generated by their tyranny and oppressions, the Brahmins refused to perform the Upanayan of the Shudras.
  6. Owing to the denial of Upanayan, the Shudras who were Kshatriyas, become socially degraded, fell below the rank of Vaishyas and thus came to form the fourth Varna: Shudras.

 

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हिंदी अनुवाद

“वह क्या है जो इस पुस्तक के बारे में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है? निसंदेश वह निष्कर्ष जो मैंने इस पुस्तक के लिखने के दौरान अपने शोध से निकाला है। इस पुस्तक में दो प्रश्न उठाए गए हैं: शूद्र कौन थे? वे आर्यों के समाज में चौथे वर्ण पर क्यों पहुंच गए?

इस विषय पर मेरा (डॉक्टर भीमराव अंबेडकर) निष्कर्ष निम्न प्रकार है:

  1. “शूद्र” आर्यों के सूर्यवंश के क्षत्रिय थे।
  2. एक समय था जब आर्यसमाज (वैदिक या सनातन समाज) में सिर्फ तीन वर्ण थे: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य।
  3. शूद्रों का कोई अलग वर्ण नहीं था और वह छत्रिय वर्ण का हिस्सा थे।
  4. इन क्षत्रियों (बाद में जो शूद्र हुए) और ब्राह्मणों में लगातार संघर्ष चलता रहा। (क्योंकि ब्राह्मण निहत्थे और राज्य शक्ति विहीन थे तो शूद्रों ने उनके ऊपर अपरिमित अत्याचार किए और उन्हें बहुत अपमानित किया। यह अत्याचार काफी लम्बे समय तक चलता रहा)।
  5. इस अपमान और अत्याचार से त्रस्त होकर ब्राह्मणों ने यह निर्णय लिया कि वह इन क्षत्रियों का उपनयन संस्कार नहीं करायेंगे और शिक्षा नहीं देंगे।
  6. ब्राह्मणों के इस संगठित बहिष्कार के कारण शूद्रों का उपनयन संस्कार होना बंद हो गया और उन्हें शिक्षा मिलना भी बंद हो गई जिसके परिणाम स्वरूप उनका समाज में स्तर गिर गया और वह धीरे-धीरे अशिक्षा से और अनादर से क्षत्रिय समाज से बाहर हो गये। इन्हीं “पतित क्षत्रियों” को एक नये और चौथे वर्ण में रखा गया। इस प्रकार एक चौथे वर्ण “शूद्र” का निर्माण हुआ।”

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के अनुसार प्रारंभ में सिर्फ तीन वर्ण थे: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। आज के जितने भी “शूद्र” हैं वह सभी सूर्यवंशी क्षत्रिय थे, जिन्होंने शक्ति पाकर ब्राह्मणों के ऊपर बहुत अत्याचार किया। परिणाम स्वरूप ब्राह्मणों ने उनका बहिष्कार कर दिया और वे एक नए वर्ण में सम्मिलित कर दिए गए जो बहिष्कृत तिरस्कृत और अछूत था और जिसे “शूद्र” कहा गया।

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"ब्राह्मणवाद" के नाम पर मिथ्याप्रचार: भाग-2

डाक्टर भीमराव अम्बेडकर

“ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायतः ॥”

——(ऋग्वेद संहिता, मण्डल 10, सूक्त 90, ऋचा 12)

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को इस घटना के बाद की रचना मानते हैं, जिसमें चार वर्णो की उत्पत्ति ब्रह्मा के चार अंगों से बतायी गयी है।

अब यह बात यदि कोई ब्राह्मण कहता तो संभवतः लोग उस पर विश्वास ना करते या वे कहते हैं कि यह ब्राह्मणों का एक और पाखंड है। जिसे इस बात पर संशय है वह डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पुस्तक “Who Were the Shudras” को खोलकर पढ़ सकता है। यह Amazon/ Kindle पर भी उपलब्ध है।

मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि जो लोग यह प्रचार कर रहे हैं कि ब्राह्मणों ने शूद्रों पर अत्याचार किया उन्हें यह पता होना चाहिए कि पहला संगठित अत्याचार ब्राह्मणों पर किया गया। परिणाम स्वरूप ब्राह्मणों ने उनका त्याग कर दिया।

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इस बात की पुष्टि दशावतार में पहला “संपूर्ण” (पांचवां दशावतार भी मानव रूप में था किन्तु यह “वामन” अवतार था) मानवावतार भगवान परशुराम का था, जो क्षत्रियों (क्षत्रिय से मतलब आजके “ठाकुर” से नहीं है बल्कि उस युग के शासक वर्ग से है) के अत्याचार को समाप्त करने के लिए ही हुआ था। भगवान परशुराम ने शासक वर्ग के अत्याचारी राजाओं का समूल विनाश कर दिया था। कुछ लोग इसका गलत मतलब निकालते हैं कि उन्होंने क्षत्रियों का 21 बार विनाश किया था परंतु उन्होंने असल में 21 राजवंशों का विनाश किया था जो अत्याचारी थे।

ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों के अत्याचार

आज “ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों के अत्याचार का रोना रोने वाले लोगों यही नहीं पता कि जाति व्यवस्था तो कही थी ही नहीं सिर्फ वर्ण व्यवस्था थी जो किसी भी तरह से अभेद्य दीवारों से नहीं बनी हुई थी। यानी एक वर्ण के व्यक्ति को दूसरे वर्ण मे जाने की पूरी आजादी थी।

इन सब का प्रमाण हर युग में मिलता आया है। मगध का प्रथम शासक कुल (नंदवंश) नाई था और दूसरा यानी मौर्य अनाम/अकुलीन शूद्र। “जाति” शब्द ही नहीं था, “वर्ण” (class) को अंग्रेजी ईसाइयों ने जाति (caste) कर यह विष बोया।

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हर वर्ण में पैदा हुए लोग “क्षत्रिय” (राजा) हुए हैं और ऋषि (ब्राह्मण) भी हुए हैं। ऐसे भी कई उदाहरण हैं जहां जन्मना ब्राह्मण भी सिंहासनासीन हुए और जन्मना क्षत्रिय ब्राह्मण (ऋषि) बने हैं। महाराज जनक, रावण (पौराणिक युग में) और (पुष्यमित्र) शुंग, कण्व, सातवाहन, गांग इत्यादि (जन्मना ब्राह्मण) वंश राजा थे। दूसरी ओर जन्मना क्षत्रिय विश्वामित्र और भर्तृहरि कर्मणा ब्राह्मण बने।

आधुनिक/ऐतिहासिक युग में ब्राह्मणों की स्थिति ऐसी नहीं थी की किसी के ऊपर अत्याचार करते या किया। ब्राह्मण राज परिवार हुए हैं लेकिन किसी भी वर्ग के ऊपर अत्याचार करने का उनका कोई अभिलेख/उल्लेख नहीं मिलता। बल्कि उस युग में शिल्पकला, मूर्तिकला, मंदिर-निर्माण कला, विज्ञान, ज्योतिष, इत्यादि का अप्रतिम और अद्वितीय विकास हुआ है। ये अधिसंख्य शिल्पी (इंजीनियर) “शूद्र” थे।

इतने उच्च शिक्षा और कौशल का समाज “पीड़ित” कैसे हो सकता हैं? जिन्हें आज शूद्र कहा जा रहा है वह असल में अधिकतर क्षत्रिय वर्ण से आए हैं और वह हमारे संस्कृति, मंदिर, मूर्ति वास्तु के शिल्पी हैं। उनके पास उच्च कौशल (high skill) थी।

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क्षत्रिय जातियों का “शूद्रीकरण” अधिकतर विदेशी आक्रमण (मुस्लिम आक्रमण) के बाद हुआ। इस बात के काफी ठोस प्रमाण है कि आज के खटीक और पासी मूलतः क्षत्रिय थे। धर्म परिवर्तन के असहनीय दबाव के कारण उन्होंने सबकुछ त्यागकर (या छिन जाने के बाद) वन और जंगलों की ओर शरण ली। वहां पर भी उन्होंने ऐसे जानवरों (सूअर) का पालन-पोषण शुरू किया जिसे इस्लामी आक्रांता उनके आसपास भी न फटकें।

मुस्लिम सूअर को परम अपवित्र मानते हैं और जहां सुअर हों वहां जाना पसंद नहीं करते। अभी कुछ वर्ष पूर्व तक खटीक और पासी/पासवान (ये दोनों जातियां) सिर्फ सूअर पालने का कार्य करती थी। उसका प्रमुख कारण यह था कि सूअर को इस्लाम में बहुत ही अपवित्र माना जाता है। यह उन्होंने इसलिए किया ताकि उनका धर्म परिवर्तन ना किया जा सके।

हमारे आधुनिक समाज को यह समझना होगा कि जिन जातियों ने अपने धर्म-रक्षा के लिए इतना महान त्याग किया हो क्या उन्हें जाति बहिष्कृत कर या घृणित निगाह से देखना उचित है। कालांतर में यह सब बातें भूल गई और शेष हिंदू समाज भी उन्हें हेय दृष्टि से देखने लगा, और अछूत का व्यवहार करने लगा। इस विषय पर श्री अमृतलाल नागर ने काफी कुछ लिखा है।

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"ब्राह्मणवाद" के नाम पर मिथ्याप्रचार: भाग-2

इसी प्रकार से जो आज पटवा जातियां हैं उनके दो भाग हैं पटवा और लखेरा। जिन क्षत्रियों की भूमि और संपत्ति मुस्लिम शासकों द्वारा छीन ली गई और उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया वे धर्म परिवर्तन ना करके अपनी अनाम जिंदगी प्रारंभ की। उसमें जो लाख से चूड़ियां बनाते थे उन्हें “लखेरा” और जो सिंगार के साथ धागे और सिंदूर बिंदी इत्यादि का कार्य करने लगे उन्हें “पटवा” कहा जाने लगा।

ब्राह्मणों की भी कुछ ऐसी जातियां हैं जिन्हें आजकल “शूद्र” में गिना जाता है, जैसे लोहार। राजस्थान के जितने भी जांगिड़ ब्राह्मण हैं वह सभी लोहार हैं। लोहार का कार्य करते हुए भी वह अपने आप को जांगिड़ ब्राह्मण कहते हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी लोहार अपने को “लोहार ब्राह्मण” कहते हैं। उसका कारण यह है कि सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और संभवतः मुस्लिम शासकों के धर्म परिवर्तन के दबाव के कारण उन्होंने अपना पैतृक पेशा छोड़कर एक कौशल को अपना लिया जिसमें हथियार और औजार बनाने का कार्य करने लगे।

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कहने का कुल तात्पर्य यह है कि वर्ण (आज जिसे भ्रष्ट कर “जाति” कहा जा रहा है) कोई कठोर पैतृक/वंश विभाजन नहीं था। आज के बहुसंख्य “शूद्र” वर्षों पूर्व क्षत्रिय (और ब्राह्मण भी, जैसे लोहार/सोनारादि) थे। इसी प्रकार पार्थियन, सीथियन, कुषाण इत्यादि बाहरी जातियों को यज्ञ और संस्कार के बाद “क्षत्रिय” का सम्मान दिया गया क्योंकि वह “शासक” थे। स्वतंत्रता के ठीक बाद 552 रजवाड़ों में लगभग दो-तिहाई उस जाति के थे जिन्हें आजकल “पिछड़े वर्ग (OBC)” में रखा गया है। इसलिए ब्राह्मणों को दोष देना या “ब्राह्मणवाद” का प्रचार अज्ञान और मूर्खतापूर्ण है।