अकबर ने कैसे अपने साम्राज्य को स्थापित किया?

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अकबर के शासन-सम्बन्धी सुधार साम्राज्य के स्तम्भ थे। वह सुधार दो हिस्सों में बांटे जा सकते हैं। प्रथम वह सुधार जिन्होंने हिन्दुओं को मुसलमान-राज्य के कट्टर शत्रु से हितैषी मित्र बना दिया, और दूसरे वह सुधार जिन्होंने राज्य को सुसंगठित और मजबूत आधार पर खड़ा कर दिया। पहले प्रकार के सुधारों के विषय में इस आलेख में लिख चुके हैं, इस आलेख में हम उन सुधारों की चर्चा करेंगे, जिन्होंने सिद्ध कर दिया था कि अकबर की प्रतिभा शासन में भी उसी तीव्रता और आत्मविश्वास से चलती थी जिससे युद्ध में सदियों बीत गईं और अवस्थाओं में पूरा उलट-फेर हो गया, पर आज भी शासन नीति के वह करिश्में, जिन्हें अकबर दिखा गया है, भारत के विदेशी राज्य में जीवित हैं।

अकबर से पहले मुसलमान राजा इन उसूलों पर राज्य करते थे कि हिन्दुस्तान मुसलमान विजेताओं की जायदाद है, हिन्दू रियाया रहकर केवल मुसलमान विजेताओं की कृपा पर जी सकते हैं। उन्हें जीवित रहने के लिए जजिया नाम का कर देना पड़ता था। मुसलमान बादशाह और मुसलमान लड़ाकू हिन्दुस्तान के मैदान में फौज के कैम्प की तरह रहते थे। बादशाहों को मुसलमान सरदारों तथा सिपाहियों पर भरोसा रखना पड़ता था।

हरेक मुसलमान सिपाही, अपने आपको राज्य का स्तम्भ समझता था। जो दस सिपाहियों को इकट्ठा कर सकता था, यह नवाब बन जाता था। विजय की इच्छा रखने वाले बादशाह इसी मसाले को एकत्र करके भौज बना लेते थे और महत्वाकांक्षा को पूरा करते थे। बादशाह या सुल्तान की इच्छा ही कानून थो। शेरशाह सूरी को छोड़कर अकबर से पहले किसी मुसलमान बादशाह ने देश के लगान या अन्य कानून को नियम में लाने का यत्न नहीं किया। तलवार हो कानून था, और लड़ाकू सिपाही ही उसके चलाने वाले थे काजी और अमोर अदल भी नियुक्त किये जाते थे, पर उनकी किताब और जिला प्रायः तलवार की दासी ही रहती थी।

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अकबर के सुधारों को हम तीन शीर्षकों के नीचे ला सकते है

१. व्यक्तिगत निरीक्षण

जहाँ कहीं भी एकसत्तात्मक ढंग पर राज्य चलेगा. वहाँ शासक का गुण या अवगुण राज्य को अच्छाई या बुराई का कारण होगा। यदि शासक उदार है तो शासन भी उदार होगा, परन्तु यदि शासक की दृष्टि संकुचित है, तो राज्य का संचालन भी अनुदार सिद्धान्तों के अनुसार हो होगा। राजा मेहनत करेगा तो राज्य सुरक्षित रह सकेगा. राजा सुस्त हो जायेगा तो राज्य बरबाद हो जायेगा।

अकबर की सत्ता अवाधित थी। उसके राज्यकाल के यश या अपयश के लिए वह स्वयं उत्तरदाता है। मुसलमानों के राज्यकाल के उतार-चढ़ाव शासकों के अवगुण या गुण के साथ जुड़े हुए हैं। बाबर बहादुर और साहसी था, उसने हिन्दुस्तान में बादशाहत कायम कर दी, हुमायूं था बहादुर परन्तु अस्थिरमति था, उसे पीठ दिखाकर भागना पड़ा। अकबर बहादुर था, साहसी था, परिश्रमी था और दूरदर्शी था। उसने मुगल साम्राज्य को फिर से स्थापना की और उसकी जड़ों को गहराई तक पहुँचा दिया। गहराई तक पहुँचने और परिश्रम से समस्या को हल करने की जो शक्ति अकबर में थी, यह कम लोगों में मिलेगी उसने जितने विजय प्राप्त किये, वह अपने बाहुबल से। उसने जितने शासन-सुधार किये, वह अपने मस्तिष्क बल से।

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वह कहा करता था कि “यह सौभाग्य की बात थी कि मुझे कोई योग्य वजीर नहीं मिले, यदि मिल जाते तो लोग यही कहते कि सब सुधार वज़ीरों ने हो किये हैं। ” शासन के जितने महकमें थे, उन सब पर अकबर की दृष्टि थो, उनको चलाने में उसका हाथ था। अकबर के समय में शासन उत्तमता से चला और एकसत्तात्मक राज्य में जहाँ तक दोप कम हो सकते हैं, कम हो गये इसका प्रथम कारण यह था कि अकबर की दृष्टि शासन के हरेक महकमें पर रहती थी, और प्रतिभा तथा मेहनत की कृपा से वह जिस काम में हाथ डालता था, उसे पूरा कर देता था। राज्य के हरेक महकमे पर उसकी कड़ी नज़र रहती चौ, और प्रतिभा का चमत्कार देखिए कि वह प्राय: हरेक प्रश्न के ठीक उत्तर तक पहुँचने में सफल हो जाता था।

२. मशीनरी का सुधार

शासन के कारखाने को ठीक ढंग से चलाने के लिए यह भी आवश्यक होता है कि मशीन को धो-मांज कर ठीक किया जाय। जो शासक मशीन का सुधार नहीं करता, वह अपना सारा बुद्धि-बल लगाकर भी राज्य-संस्था को ठीक ढंग से नहीं चला सकता। अकबर ने सुल्तानी राज्य की अनघड़ मशीन को सुघड़ बनाने के लिए बहुत से सुधार किये, जिन्होंने यपि प्रणाली को नहीं बदला परन्तु उस समय राज्य चलाने वाले संगठन को अवश्य मजबूत बना दिया। राज्य का फोजी स्वरूप जैसा का तैसा बना रहा, परन्तु उसके दोपों को यथाशक्ति दूर करने के लिए अकबर ने भरसक यत्न किया। यह गवनरों पर कड़ी नजर रखता था अपने जीवन काल में उसे जितने युद्ध करने पड़े उनमें से अधिकांश अपने सुबेदारों के विरुद्ध ही थे। जहाँ सुना कि सुबेदार बिगड़ने लगा है कि स्वयं पहुँचकर गर्दन दबा दी, जिससे या तो यह सोधे रास्ते पर आ गया या पदच्युत किया गया।

सूबों या अन्य अधिकारियों के बंटवारे में अकबर सबसे ऊंचा स्थान, योग्यता और कार्य- शक्ति को देता था। कोई हिन्दु है या मुसलमान, यह इस ओर ध्यान नहीं देता था। इसमें सन्देह है कि यदि राजा टोडरमल को केवल हिन्दू होने से शासन के काम में दखल देने से रोका जाता, तो अकबर के राज्यकाल की आधी चमक जाती रहती। जिस राज्य में अधिकारियों को नियुक्ति योग्यता से नहीं, रंग या जाति देखकर की जाती है, उसमें कई तरह के दोष आ जाते हैं । योग्यता का स्थान चापलूसी, रियायत और रिश्वत को मिल जाता है । अकबर ने यथाशक्ति योग्यता को उचित स्थान पर बिठाया और ऐसा करने में हिन्दू और मुसलमान के भेद को मिटा दिया। इससे अधिकार के लिए योग्यता का होना आवश्यक समझकर कार्यकर्ता अधिक मेहनत करने लगे।

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सेना-विभाग में अकबर ने यह रोति प्रचलित की कि रईसों और सेनापतियों को जमीनें बाँट दी उन जमीनों को वही रक्षा करें और वही उनसे लगान वसूल करें। जमीन के बदले में वह युद्ध के समय सिपाहियों की परिमित संख्या लेकर राज्य की सहायता के लिए उपस्थित हों। यह रोति आदर्श से कितनी ही गिरी हुई हो, उससे पूर्ववर्ती रोति से अवश्य ही सुधरी हुई थी। पठान बादशाहो के समय में सिपाहियों या सिपहसालारों का शान्ति की दशा में अपना भोजन और निर्वाह स्वयं ढूंढना पड़ता था, जिससे वह प्रायः गरीब रियाया के झोपड़ों में लूट द्वारा तलाश करते थे। अकबर ने उनके लिए जायदादें निश्चित कर दी जिससे बहुत से अत्याचार और लूट-खसोट कम होने के अतिरिक्त सैनिक नौकरी में कुछ स्थिरता भी आ गई।

३. लगान-पद्धति का सुधार

राज्य प्रबन्ध में सबसे बड़ा सुधार, जिसके लिए अकबर विख्यात है, वह भूमि कर के सम्बन्ध में था। भारतवासो जमोन पर जीते हैं। खेती इस देश का पेशा है। भारत की उर्वरा भूमि सोने की चिडिया है जो शासक इस चिड़िया को खिला-पिलाकर सोने के अप्डे देने के योग्य दशा में रख सकता है, वह दौलत के ढेर में लोट सकता है, परन् जो चिड़िया का गला घोंटकर या पेट चोरकर अण्डे निकालना चाहता है, वह भूखा मर जाता है। अकबर से पूर्व के मुसलमान बादशाहों में, एक शेरशाह सूरी को छोड़कर अन्य किसी ने भी उपयुक्त सच्चाई को नहीं समझा था। वह चिड़िया का पेट चोरकर अण्डे निकालना चाहते थे।

अकबर ने चिड़िया को पालने का निश्चय किया, भूमि के लगान का ऐसा प्रबन्ध किया कि आज तक के शासक उस पर ‘वाह-वाह’ कहे बिना नहीं रह सकते। भारत का राज्य पलट गया है। परन्तु राजा टोडरमल ने जो लगान की नीति प्रचलित की थी, सिद्धान्त रूप में आज भी बही मानी जाती है। अकयर के वजीर राजा टोडरमल का नाम भारत के इतिहास में अमर हो गया है। उस राजभक्त राजपूत क्षत्रिय ने भूमि कर को संगठित और नियमित करके अकबर के साम्राज्य की जड़ों को पाताल तक पहुंचा दिया, और आगे आने वाले शासकों को समार्ग दिखला दिया। अकबर की इस बात का श्रेय है कि उसने भूमि और भूमि-कर के प्रजा और राजा पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा और राजा टोडरमल जैसे योग्य अर्थनीतिज्ञ को खुले हाथ से कार्य करने दिया। अकबर से पूर्व मुसलमान बादशाह भूमि-कर का एक ही उसूल

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मानते थे। जो कुछ जमीन से मिले, ले लो, किसान के पास अगले साल बोने के लिए अनाज नहीं बचा तो न सही, अगर वह भूखे मर गया तो बादशाह की बला से। भूमि की उपज का अधिक से अधिक भाग विजेता के कोष में जाना चाहिए। परिणाम यह होता है कि उपजाऊ जमीनें बंजर होती जाती थी, और ग्राम के ग्राम उजाड़ हो गये थे। मुसलमान शासकों में से शेरशाह सूरी ने पहले पहल इस उसूल को समझा कि जमीन को उपज और सरकार की मांग के बीच में एक ऐसा भी हिस्सा रहना चाहिए जो जमीन को सरसब्ज और किसान को जीवित रख सके, तभी बादशाह की आय स्थिर हो सकती है।

शेरशाह को समय न मिला. उसकी शक्ति भी कम थी। अकबर ने इस असूल को समझ लिया। समझाने वाले का नाम राजा टोडरमल था। यह वही राजा टोडरमल था, जिसने उस समय के हिन्दुओं को राजभाषा फारसी पढ़ने के लिए तैयार करके उन्हें राजकार्यों में मुसलमानों के समान अधिकार दिलाने का भी यत्न किया था। मुसलमान कालीन राजनीतिज्ञों में राजा टोडरमल का नाम सबसे ऊपर है।

राजा टोडरमल के किये हुए सुधारों का उद्देश्य जमीन के परिणाम, उसकी उपज और भूमि-कर को निश्चित कर देना था सबसे प्रथम भूमि का नपैना स्थिर किया गया। फिर सारी जमीन को नापा और उसको उपज का हिसाब लगाया गया।

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जमीन को निम्नलिखित चार हिस्सों में बाँटा गया

  1. पूलाज-निरन्तर बोई जाने वाली जमीन।
  2. परौती-खाली छोड़ी हुई जमीन, जो साल दो साल में काम की बन सकती है।
  3. चचर-तीन-चार साल से खाली छुटी हुई जमीन।
  4. बंजर-पाच या उससे अधिक वर्ष से खाली छुटी हुई ज़मीन।

इन चारों प्रकार की भूमियों पर लगान की भिन्न-भिन्न मात्रायें लगाई गई। किसी भूमि से उपज का एक-तृतीयांश से अधिक भाग लगान के रूप में नहीं लिया जाता। यद्यपि प्राचीन हिन्दू नियम के नुसार छठा या पांचों भाग हो लगान के रूप में लिया जा सकता है. और इस दृष्टि से अकबर का लगान सम्बन्धी निश्चय कठोर प्रतीत होता है, परन्तु मुसलमान शासन-काल में सौ फीसदी लगान भी असम्भव नहीं समझा जाता था, सारी भूमि का स्वामी बादशाह समझा जाता था, उसकी इच्छा थी कि वह किसान के पास एक समय का भोजन छोड़े या नहीं। इस अव्यवस्था को दशा में अकबर का लगान सम्बन्धी कानून रात्रि के घोर अन्धकार में दीपक के प्रकाश के समान प्रतीत होता है।

जमीन की उपज और रियासत की मांग के बीच में किसान के भरण-पोषण के साधन छोड़ने के अतिरिक्त एक बहुत लाभदायक नियम यह बनाया गया था कि किसी किसान को जमीन के बोने के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत हो, तो राजकोष से कर्ज दिया जाय और धीरे-धीरे वसूल किया जाय।

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लगान सम्बन्धी नियम केवल कागज पर हो नहीं रहे, उन्हें कार्य में भी परिणत किया गया। जमीन नापी गई और उसे उपजाऊ बंजर आदि हिस्सों में बाँटा गया। लगान के वसूल करने के लिए अफसर नियुक्त किये गये यह सोचकर कि वसूल करने में अन्याय न हो, अपील सुनने के लिए अलग अफसर नियुक्त किये गये हर महोने या तीसरे महीने लगान वसूल करके खजाने में भेजा जाता था हरेक आदमी की जायदाद और जमीन का चिट्ठा तैयार किया गया और हिसाब- किताब तथा जायदाद सम्बन्धी सब कागज सरकारी दफ्तर में प्रति मास भेज दिये जाते थे लगान की मात्रा का निश्चय १९ वर्ष के लिए किया जाता था ताकि किसान लोग सुरक्षित रहकर भूमि को यो सकें, उसकी उपज का आनन्द भोग सकें और उसे अपनी समझकर उपज बढ़ाने के लिए यत्नवान् हों।

लगान सम्बन्धी सुधारों ने जहाँ एक ओर किसान को सुखो और रियाया को सन्तुष्ट कर दिया, वहाँ राज्य को आमदनो को बढ़ा दिया और सिर कर दिया। अब शासक साल भर की आनुमानिक आय की कल्पना करके वार्षिक व्यय का चिट्ठा तैयार कर सकता था आय निश्चित और स्थिर हो गई, जिससे राजा के कर्मचारियों के हृदय में यह विचार उत्पन्न होना स्वाभाविक था कि उन्हें उनका वेतन मिल जायेगा और प्रजा को लूट-खसोट कर पेट-पालन करने की आवश्यकता न होगी।

राजा टोडरमल के इन सुधारों ने अकबर के राज्य की नौव को पाताल तक पहुँचा दिया। प्रजा सन्तुष्ट हो गई, राज्य कर्मचारियों स्थिरता से कार्य करने लगे बादशाह को आमोद-प्रमोद करने के लिए रियाया का लूटना अनावश्यक प्रतीत होने लगा। अकबर की उदार और दूरदर्शता- पूर्ण नीति ने उसे राजा टोडरमल जैसा योग्य मन्त्री दिया और राजा टोडरमल ने मुगल साम्राज्य को स्थिरता प्रदान की आजकल ब्रिटिश राज्य की जो लगान-नीति है, वह उस लगान-नीति का रूपान्तर मात्र है।

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