October 25, 2020
अकबर का राज्यारोहण

अकबर का राज्यारोहण

पानीपत की दूसरी लड़ाई के अन्त की घटना है बंगाल का सेनापति हेमू ‘हवा’ नाम के हाथी पर सवार होकर मुगल-सेनाओं के मध्य-भाग पर ढाया कर रहा था। इतने में दुश्मन का एक तीर आकर उसकी आँख में लगा हेमू हौदे में गिर पड़ा। सेनापति से बिहीन सेना भाग खड़ी हुई और ‘हवा’ और ‘हवाके सवार’ मुगल-सेनापति बैरमखा ने बन्दी हुए।

बैरम खान बदमाश काफिर को पीटकर १३ वर्ष के नाबालिग बादशाह अकबर के सामने ले गया और उससे बोला कि ‘तलवार लेकर मरते हुए काफिर के जिस्म में घोंप दो।

‘ बैरमखों केवल सेनापति ही नहीं था, वह एक प्रकार से युवक-यादशाह का संरक्षक भी था। अकबर ने उसके प्रस्ताव का जो उत्तर दिया, वह मुसलमान राज्य के इतिहास में अनूठा है उसने कहा कि में अर्धमृत शरीर पर हथियार कैसे चला सकता है।’ बात छोटी-सी थी, पर उसने आनेवाले अकबर की सूचना दे दी। वह वीर था-आखिर वह बाबर का पोता था।

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बाबर का पोता अकबर 

वह सभ्य था, हुमायूँ का रुधिर उसके शरीर में यहता था। यह दोनों गुण पैतृक हो सकते थे, पर एक तीसरा गुण था जो उसका अपना था। वह गुण धा-मनुष्यता ।
१५५६ ई० में राजगद्दी पर बैठकर अकबर ने एक नये युग को जन्म दिया। भारत के मुसलमानी राज्य में उसने एक नये गुण का प्रवेश किया। उससे पूर्व वीर और चमकदार मुसलमान राजा हो गये थे, परन्तु उनमें से कोई भी मनुष्यता में अकबर के समीप नहीं पहुँचता था वीर का आदर, दीन पर दया, हृदय में उदारता, शत्रु से संग्राम और मित्र पर विश्वास यह मनुष्यता के चिह्न हैं। केवल वीरता से राज्यों की स्थापना हो सकती है, पर साम्राज्यों की रक्षा नहीं हो सकती।

जहाँ वीरता को पक्की ईंटों को मनुष्यता को मजबूत सीमेंट से जोड़ा जाता है, वहाँ साम्राज्य की अभेद्य दीवारें खड़ी हो जाती हैं। अकबर में वीरता और मनुष्यता का मेल था। यही उसकी सफलता का मूल मंत्र था। हुमायूं के भाग्य खोटे थे। उसमें बाबर की वीरता तो थी, पर अपने पिता का-सा सितारा नहीं था। जीवनभर में उसने फिसलने का कोई मौका नहीं छोड़ा। यदि फिसलने का मौका हो, तो हुमायूं उसे छोड़ने वाला नहीं था।

अकबर का राज्यारोहण
बाबर

जीवनभर यह सौभाग्य की सीढ़ियों से फिसलता रहा। अन्त में भी वह फिसलकर मरा। वह ईद के चाँद को देखता हुआ महल की सीढ़ियों से उतर रहा था कि उसका पांव फिसल गया। १३ वर्ष के पुत्र को पत्तियों के अपार समुद्र में तैरता हुआ छोड़कर अभागा हुमायूं संसार से चल दिया। उस समय मुगल-राज्य की सीमा पंजाब से आगे नहीं बढ़ी थी। नाम को दिल्ली इसकी राजधानी थी, परन्तु कुछ दिनों में वह भी बंगाल के शासक हेम की अधीनता में आ गई।

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हुमायें की मृत्यु का समाचार सुनकर देश भर के साहसिक पुरुषों के दृदय में एक उमंग-सी उठ खड़ी हुई। सबने शेरशाह सूर के चरण चिह्हों पर चलकर राज्य स्थापना का मन्सूबा बाँधा। उन सबमें से हेमू बनिये को हो कुछ क्षणिक सफलता प्राप्त हुई। वह जात का लिया था, पर अपने गुणों से बंगाल का सेनापति और शासक बन गया था मुगल राजा की मृत्यु का संवाद सुनकर उसने भारत के सम्राट बनने की दिल में ठानी और एक ही पत्ते में बंगाल से दिल्ली तक का मैदान सर कर लिया।

आगरे में उसे किसी ने न रोका, दिल्ली के शासक तार्दीबेर को उसने मार भगाया, और मुगल-सेना के शेष भाग को समाप्त करने के लिए पंजाब की ओर प्रयाण किया। दिल्ली में अपना झण्डा गाड़कर हेमू ने उचित समझा कि पद के योग्य ही नाम भी धारण किया जाये जय पानीपत के मैदान में ‘हवा’ पर उड़ रहा था, तब वह हेमू नहीं था, की है।

राजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य था यह घटना १५५७ अकबर हेमू को परास्त करके दिल्ली में प्रविष्ट हुआ पुंश्चली दिल्ली ने जैसे उससे पूर्व अनेक राजाओं का भुजायें फैलाकर स्वागत किया था, वैसे ही अकबर का भी किया।

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आगरा ने दिल्ली का अनुकरण किया। कुछ समय पूर्व बनारस, ग्वालियर आदि नगर जीतकर अकबर के राज्य में सम्मिलित कर लिये गये। सिकन्दर को पहाड़ में दूँढ़कर समाप्त किया गया। इस प्रकार चार वर्ष तक बैरम खाँ ने नाबालिग राजा के नाम पर राज्य की बागडोर को संभाले रखा। १५६० में अकबर ने स्वयं राजा बनने का निश्चय किया बैरम खां परिवार का पुराना हितेषों सेवक था, अकबर का संरक्षक था शासन का मुखिया था।

एक सत्तात्मक राज्य में ऐसे शासक की स्थिति बड़ी प्रबल परन्तु साथ ही खतरों से घिरी होती है। प्रबल इसलिए कि शासन के अधिकार के साथ राजा के प्रति उपकार का भाव जो मिला हुआ होता है साधारण अहलकार राजा से उतना नहीं डरते, जितना उसके मंजूरे नजर से डरे हैं। यह बादशाह से दण्ड और दया दोनों की आशा रखते हैं परत्तु उसके कृपा-पात्र से केवल दण्ड की क्योंकि बादशाह को जो सम्मानित पद जन्म अधिकार से प्राप्त होता है, उसके एजेण्ट को वह भय द्वारा प्राप्त करना पड़ता है।

ऊचे पद के लिए ईर्ष्या मनुष्य मैं स्वभाविक

लोग उससे डरते हैं, परन्तु यह कभी यह अनुभव नहीं कर सकता कि ज्वालामुखी पर नहीं बैठा है उसका आसन सदा कम्पायमान रहता है उसका पद राजा की कृपा या लाचारी का परिणाम होता है। एक हवा का झोंका, एक मन की मौज, एक छोटा सा गुप्त तौर, कृपापात्र के भाग्यों का अन्त कर सकता है।बेरमो के साथ भी यही हुआ। ऊँचे पद के प्रति ईर्ष्या मनुष्य के स्वभाव में पाई जाती है। असमानता और डाह जुड़वा बेटियां हैं। दोनों इकट्ठी हो उत्पन्न होती है। बैरम से ईर्ष्या करने वालों की कमी नहीं थी। अकबर को जिस भाय ने पाला था, उसका नाम माहम अनगा था। हुमायूँ की मृत्यु के पीछे अकबर ने उसे माता के स्थान पर बिताया।

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यदि मुल्क में बैरम का राज्य था, तो महल में महामंगा का सिक्का चलता था दोनों के राज्य अलग-अलग थे, परन्तु दोनों एक दूसरे से जलते थे बैरम अकबर पर अद्वितीय राज्य चाहता था, और महामंगा अपने औरस पुत्र आधमाँ के लिए रास्ता साफ करना चाहती थी वह पुत्र-स्नेह से अन्धी औरत अकबर के हृदय में बैरम के विरुद्ध जहर भर्ती रहती थी। वेरम यह जानता था। उसे यह भी मालूम था कि दरवार के अधिकांश सरदार उससे डाह रखते हैं। खतरे के समय अधिकार सम्पन्न लोग अधिकार रक्षा के लिए उतावले हो उठते हैं।प्राय: उतावली में न्म से नर्म प्रकृति के मनुष्य भी कठोर हो जाते हैं। ज्यों-ज्यों बैरम का खतरा बढ्ता गया उसकी तबियत में कठोरता आती गई वह संदेह शोले, उग्र और प्रतिकार प्रिय होता गया। एक शाही हाथी ने खानकाना के हाथी को लंगड़ा कर दिया, इस पर शाही हाथी के महावत को मृत्यु दण्ड दिया गया।

अकबर का राज्यारोहण

अपने असली और कल्पित दुश्मनों को नष्ट करने के लिए उसने पौर मुहम्मद नाम के मुल्ला को कारिन्दा बना लिया था।उसके द्वारा बैरम ने कई अत्याचार और अनाचार किये, परन्तु अन्त में सन्देहशील मालिक के कोप से मुल्ला भी न बच सका, जो लोग अत्याचारियों के औज़ार बनाते हैं, उनकी यही गति होती है। पीर मुहम्मद भी बेइज्जती से निकाला गया। उसे बैरम ने मक्के जाने का आदेश किया, मानो अकबर को अपने खान पान से छूटने का मार्ग दिखाया जब पौर मुहम्मद गुजरात के पास पड़ा था, तब बैरम के आदमियों ने उसे लूटकर विल्कुल नंगा कर दिया। उस अत्याचार के औज़ार ने हाथों हाथ कर्मों का फल पा लिया।

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अब बैरम खां को गिरने के लिए रास्ता साफ हो गया। शीघ्र ही वह निचे की ओर जाने लगा। यह कहना है कि अकबर ने केवल महामंगा की बहकावट में आकर बैरम को निकाल दिया, ठीक नहीं है। अकबर के हृदय में उमंग थी। उसकी आत्मा बैरम को जंजीरों में देर तक बंधी नहीं रख सकती थी।अवश्य ही बैरम खां के अत्याचारों को अकबर नापसन्द करता होगा शिकार के बहाने से वह अपने चचो भाई मिर्जा अबुल कासिम को साथ लेकर दिल्ली पहुंचा और राज्य की बागडोर अपने हाथों से ले ली।

बैरमखां को अपने उस्ताद अबुल लतीफ द्वारा कहला भेजा कि ‘मुझे तुम्हारी ईमानदारी और सच्चाई का विश्वास था, इसलिए मैंने राज्य के सब आवश्यक कार्य तुम्हें साँप छोड़े थे और अपनी खुशी में मस्त था।परन्तु अब मॅंने राज्य की बागडोर अपने हाथ में लेने का निश्चय कर लिया है। उचित है कि अब तुम मक्के की तीर्थ यात्रा पर चले जाओ, क्योंकि तुम बहुत समय उसकी इच्छा प्रकट करते आये हो। हिन्दुस्तान के परगनों में से एक काफी लम्बी-चौड़ी जागीर तुम्हारे गुजारे के लिए दे दी जाएगी, जिससे आमदनी तुम्हारे एजेण्ट तुम्हें भेज देंगे।

बैरम खान मक्का के रास्ते पर रवाना हो गया

बैरमखां इस आज्ञा का अभिप्राय समझ गया अधिकार के लिए बादशाह के पास भेज दिये और स्वयं मक्के के रास्ते पर रवाना हुआ, परन्तु शीघ्र ही उसका विचार बदल गया। मार्ग में विद्रोह का भूत उसके सिर पर सवार हो गया। परन्तु अकबर हुमायूँ नहीं था अकबर की भेजी हुई सेना ने उसे मार-मारकर शिवालिक की तलहटियों में खदेड़ दिया। बैरम ने हार मान ली और आत्म-समर्पण कर दिया। उस समय अकबर की मनुष्यता जाग उठी। राजनीति के कोष में राज विद्रोह से बढ़कर कोई पाप नहीं है।

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भारतवर्ष के मुसलमान राजाओं की साधारण राजनीति के अनुसार अकबर को चाहिए था कि बैरम को मृत्यु दण्ड देता परन्तु हुमायूँ का पुत्र किसी दूसरी ही मिट्टी का बना हुआ था। अकबर ने बैरम को दरबार में बुलवाया। दरबार के सब अमीर और खान उसके स्वागत के लिए द्वार तक गये। बैरम नंगे सिर नंगे पाँव गले में दुपट्टा लपेटकर अकबर के सामने हाजिर हुआ और दण्डवत् लेट गया। अकबर ने अपने हासन से उतरकर वैरम को उठाया और प्रधानमंत्री के आसन पर बिठाते हुए कहा-“यदि बैरम खान को फौजी जीवन पसन्द है, तो कालपी और चन्देरीका शासन कैसे किया जाता है यदि वह दरबार में रहना चाहे तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं, पर यदि वह मक्के को यात्रा को ही पसन्द करे, तो उसके साथ यथोचित गार्ड भेजने में हमें कोई एतराज नहीं।

अकबर का राज्यारोहण
बैरम खान

” यह अकबर की अन्तरात्मा का शब्द है। बैरम खां ने आखिरी प्रस्ताव को ही पसन्द किया, क्योंकि उसने कहा कि ‘जब अकबर बादशाह का विश्वास उठ चुका है, तो मैं अब उसके सामने कैसे आ सकता हूँ?’ वह मक्के की यात्रा के लिए रवाना हुआ परन्तु अभी वह हिन्दुस्तान की सीमा से पार नहीं हुआ था कि एक पठान ने पुरानी दुश्मनी के कारण उसे मार डाला। इस प्रकार अकबर एक बन्धन से छुटकारा पा गया, परन्तु ए और बन्धन था, जिसे तोड़ना बाकी था। वह बन्धन था, धर्म-माता का।अभी तक महलों में माहम अनगा का अखण्ड राज्य था। बैरम के मरने पर उसने बाहिर भी अपने असर को फैलाना आरम्भ किया। औरत होने से वह स्वयं याहिर के कामों में दखल नहीं दे सकती थी, इस कारण अपने औरस पुत्र आधम खाँ को सिफारिशों के सहारे बहुत दूर तक पहुँचा दिया।

वह मालवे का हाकिम बना दिया गया एक अयोग्य पुरुष केवल सिफारिश के सहारे ऊँचा पहुँचकर कितनी नीचता दिखा सकता है, यह आधम खाँ ने अपने व्यवहार से सिद्ध कर दिया। मालवे में बाजबहादुर नाम का पठान हुकूमत करता था उसे परास्त करके आदमियों ने उसके हरम पर कब्जा कर लिया बाजबहादुर के हरम में एक रूपमती नाम की हिन्दू महिला थी, जो अपनी सुन्दरता और कविता के लिए भारतभर में मशहूर थी।

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आदमी उस पर आसक्त हो गया, और उससे प्रेम की भिक्षा माँगने लगा रूपमती ने भिक्षा देने के लिए रात का समय निश्चित किया, और निश्चित समय पर बढ़िया कपड़ों और कीमती हीरों से सजकर मुंह ढापकर लेट गई आसा और उमंग से भरे हुए आधम खाँ ने बड़ी उत्सुकता से रूपमती के मुंह पर से पर्दा उठाया, तो वहाँ केवल लाश को पढ़ा पाया। हिन्दू रमणी ने जहर खाकर अपने सतीत्व की रक्षा कर ली थी यह खबर शीघ्र ही अकबर के पास पहुंच गई। आधम खाँ ने एक और भी अपराध किया उसने बाजबहादुर से जो खजाना लूटा था, उसे अपने पास रख लिया। पराजित शत्रु के हरम और खजाने पर उस बादशाह में बादशाह का हो अधिकार समझा जाता था।

अकबर ने आदमख़ाँ को दबोचा

अकबर अपने अधिकार के बलपूर्वक समर्थन के लिए बाज की गति से मालवे पर चढ़ आया। गांव के पास अकबर ने आदमख़ाँ को जा दबोचा और हरम की औरतों को अपने कब्जे में कर लिया। आदमख़ाँ के लिए सिर झुकाने के सिवा कोई चारा नहीं था, परन्तु सिर झुकाकर भी उसने नीचता का परित्याग नहीं किया। रात के समय वह बाजबहादुर से छीनी हुई दो औरतों को अकबर के हरम में से ले भागा।

अकबर ने घोड़े को पकड़ने के लिए सिपाही भेजे, जो उसे पकड़कर ले आये। उस समय माहम अनगा ने उस क्रूरता का परिचय दिया, जो एक स्वार्थ से अन्धी स्त्री में ही सम्भव है उसने उन दोनों औरतों को इसलिए मरवा डाला कि वह अकबर के सामने आधम के विरुद्ध गवाही न दे दें। अकबर ने इन दो खूनों को कितना अनुभव किया होगा यहकहना अनावश्यक है। कुछ समय पूर्व माँ और बेटे के अपराधों का प्याला लबालब भर गया। दरबार में आने के पश्चात् आधम खाँ की महत्वाकांक्षा यह हुई कि वह वजीरे आजम बने। उस समय बोरे आजम के पद पर शम्सुद्दी न नाम का सरदार प्रतिष्ठित था।

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अकबर का राज्यारोहण
आदमख़ाँ

इस शम्सुद्दीन ने बैरम खां को परास्त किया था। अकबर ने उसे पंजाब के हुकूमत से बुलाकर वजीर का काम सौंपा था। दरबार को उसकी जरूरत भी थी। जिन लोगों को बैरम खान जैसे वीर की हुकूमत पसन्द नहीं थी, वह एक पुत्र-प्रेम से अन्धी चालाक औरत और एक स्वार्थान्ध क्रूर नवयुवक की हुकूमत को कैसे सह सकते थे। दरबार में बड़ा असन्तोष था। शम्सुद्दीन के आने से कुछ सन्तोष हुआ। आधमखाँ के हाथ से तो मानो भोजन का ग्रास छिन गया। वह तड़प उठा। रात के समय, जब शम्सुद्दीन अपने मित्रों के साथ बैठा हुआ था, आधमखाँ हाथ में नंगी तलवार लिये हुए आया और उसने शम्सुद्दीन पर वार किया।

वह वेचारा उठकर भागा, परन्तु षड्यंत्रकारियों ने उसे घेरकर जान से मार डाला। महल में हाहाकार मच गया। खबर अकबर तक पहुंची। उसके धैर्य का भी बाँध टूट गया। वह क्रोध में भरा हुआ अपने शयनागार से निकलकर खाली हाथ ही बाहिर की ओर लपका। आधम ने जब अकबर की शेर की-सी आँखें देखी, तब उसकी सारी हिम्मत जाती रही। पैरों में गिरकर क्षमा माँगने लगा। उस समय अकबर के हृदय से दया भाग चुकी थी। आधम के हाथ में तलवार थी। अकबर खाली हाथ था।

इससे अकबर घबराया नहीं उसने इस ज़ोर से आधम के मुँह पर घँसा दिया कि वह अचेत होकर भूमि पर लोट गया। पास खड़े आदमियों को अकबर ने हुक्म दिया कि आधिम को बाँधकर किले की दीवार पर से नीचे फेंक दो। उसी समय आज्ञा का पालन हुआ और आधम को दम के दम में किये का फल मिल गया। हाहाकार सुनकर माहम अनगा भागी हुई अकबर से आजम के लिये दया की याचना करने आई, पर उस समय दया के लिए कोई जगह बाकी नहीं थी। आदमी को जीवन लीला समाप्त हो चुकी थी। इस प्रकार अकबर हिन्दुस्तान का बादशाह बना।

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