कुम्भ मेला और नागा साधू: क्या रहस्य है इन नागा साधुओ का? कुम्भ मेले के बाद कहा चले जाते है ये?

Aghori Baba

नागा साधू | कुम्भ पर्व शताब्दियों से भारत के चार नगरों में, जो कि चार दिशायों में विभिन्न नदियों के किनारे बसे हैं, धार्मिक स्नान पर्व के रुप में मनाया जा रहा है। पर इसका ऐतिहासिक और प्रामाणिक दस्तावेज बहुत पुराना उपलब्ध नहीं है। महंत लालपुरी जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि कुम्भ मेलों के वर्तमान रुप में विकास के विषय में एक मत यह भी है कि भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग गुप्त साम्राज्य (320-600 ई0) के समय में जैसे पुराणादि साहित्य पुनः सम्पादित होकर वर्तमान रुप में आए उसी तरह पुराण एवं ज्योतिष साहित्य के आधार पर कुम्भ पर्वों के स्थान तथा काल स्थायी रुप से निर्णीत होकर वर्तमान रुप में विकसित हुए।

हरिद्वार के महाकुम्भ मेले की व्यवस्थाओं का पहला उल्लेख हमें मुगलकाल के इतिहास ग्रंथ ‘खुलासातुत्तवारीख‘ जो संभवतः 1695 में लिखा गया, में मिलता है। तरीखकार इसमें लिखता है कि, हालांकि धर्मग्रन्थों के अनुसार गंगा अपने स्त्रोत से गंगासागर तक सर्वत्र पूजनीय है पर हरिद्वार इसके तट पर बसे सभी नगरों में सर्वप्रमुख है। हर साल जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है यहां बैशाखी का वार्षिक मेला लगता है और इसी के साथ विशेषकर बारह साल बाद जिस साल गुरु कुम्भ राशि में प्रवेश करता है तब यहां दूरदराज से भारी संख्या में लोग एकत्र होते हैं।

जब बात कुंभ की आती है तो नागा साधू को लेकर कई सवाल जहन में उठते हैं, आखिर कौन होते हैं ये नागा बाबा और कहां से आते हैं ? सबसे बड़ा सवाल जो हमारे जहन में आता है वह यह है कि आखिर कुंभ में दिखने वाले ये नागा साधू इसके बाद कहां चले जाते हैं? ये कुंभ मेलों में 13 अखाड़ों से आते हैं और कुंभ मेला खत्म होते ही रहस्य़ बन जाते हैं। कोई भला नागा साधू क्यों बनता है और इतनी सर्दी में भी क्यों ये बिना कपड़े के रह लेते हैं. इन्ही सब सवालों के जबाब हम तलाशने की कोशिश करते रहते है, आज उन्ही सवालों के जबाब यह देखेंगे।

क्या रहस्य है नागा शब्द की उत्पत्ति का

‘नागा’ शब्द बहुत पुराना है। भारत में नागवंश और नागा जाति का इतिहास भी बहुत पुराना है, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में ही नागवंशी, नागा जाति और दसनामी संप्रदाय के लोग रहते आए हैं। अगर हम बात करे ‘नागा’ शब्द की उत्पत्ति के बारे में तो हमको कुछ मत मिलते है और कुछ विद्वानों की मान्यता है कि यह शब्द संस्कृत के ‘नागा’ शब्द से निकला है, अब शब्द का अर्थ नहीं इसका अर्थ ‘पहाड़’ से होता है और पहाड़ पर रहने वाले लोग ‘पहाड़ी’ या ‘नागा’ कहलाते हैं। इसके अलावा ‘नागा’ का अर्थ ‘नग्न’ अथवा नंगे रहने वाले व्यक्तियों से भी है।

नागा साधू बनने के लिए क्या परीक्षाएं देनी पड़ती है

यदि आपको लगता है नागा साधू बनना आसान है तोह हम बता दे की इसके लिए इन साधुओ को कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है, नागा साधू बनने के लिए सबसे पहले अखाड़ा ज्वाइन करना पड़ता है, फिर वहा नागा बनने आए व्यक्ति की कड़ी परीक्षा होती है, सबसे कड़ी परीक्षा ब्रह्मचर्य की परीक्षा होती है, इस दौरान संबंधित साधू को तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म की दीक्षा दी जाती है।

इसमें 1 साल से अधीक का समय लगता है, इसके बाद ही उन्हें अगली परीक्षा से गुजरना पड़ता है, अगली परीक्षा में साधूओं को मुंडन कराकर पिंडदान करना होता है, पिंड दान करने का मतलब ही है इस दुनिया से अलग हो जाना फिर इसके बाद वह खुद को परिवार और सगे-संबधियों से अलग कर लेते हैं, वह सबके लिए मृत होते हैं, क्यूंकि हिन्दू समाज में पिंड दान मरे हुए व्यक्ति का ही होता है, यही नहीं उनको खुद का श्राद्ध भी करना होता हैं, श्राद्ध के बाद उन्हें अखाड़े से नई पहचान मिलती है, अब उनकी पूरी जिंदगी अखाड़ों के लिए ही होती है।

नागा साधुओं को विभूति और रुद्राक्ष धारण करना पड़ता है, नागा साधु को अपने सारे बालों का त्याग करना होता है. वह सिर पर शिखा भी नहीं रख सकता या फिर संपूर्ण जटा को धारण करना होता है, उन्हें एक समय भोजन करना होता है। वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है।

नागा साधुओ की परीक्षा यही पर खत्म नहीं होती है, इसके अलावा नागा साधु सोने के लिए पलंग, खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकता, यहां तक कि नागा साधुओं को गादी पर सोने की भी मनाही होती है। नागा साधू केवल पृथ्वी पर ही सोते हैं।

नागा साधू कहा विचरण करते है?

नागा साधू ज्यादातार बर्फिले पहाड़ियों जैसे हिमालय पर रहते हैं. इके अलावा गुफाओं में भी वह रहते हैं. कहा जाता है कि वह खाते भी बहुत कम है। वह 24 घंटे में सिर्फ एक बार खाते हैं।

आज भले ही यह परम्परा प्रतीकात्मक अधिक हो गई हो, पर किसी समय में निश्चय ही साधु-संन्यासियों का इस तरह एकत्र होना, देश-विदेश से आए हुए गृहस्थ समाज के साथ मिल बैठना, धर्मशास्त्रों से सम्बद्ध विविध विषयों की समालोचना और दार्शनिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श करना तथा अन्न-धन, दान, यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करना सारे समाज के लिए अत्यन्त प्रभावोत्पादक और प्रेरक रहता होगा।

आदिशंकराचार्य ने जिस तरह चार दिशाओं में चार आम्नाय स्थापित करके हिन्दू संन्यासियों को संगठित करते हुए अपने अद्वैत मत के प्रचार के लिए समाज को संगठित किया, लगता है उसी तरह उन्होंने जोगियों के लिए यह अनिवार्य किया कि वे भोगियों से मिलने के लिए तथा उन्हें चिंतन-मनन से दिशा दान देने के लिए बारह बरस में एक बार एक दिशा में अवश्य एकत्रित हों।

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