द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा | भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग

द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा | भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग

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भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग देश के अलग-अलग भागों में स्थित हैं। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। शिवपुराण में इन ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। इनके दर्शन मात्र से सभी तीर्थों का फल प्राप्त होता है। तो आईये, जानते हैं शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के बारे में३.

1. सोमनाथ (गुजरात, सौराष्ट्र)

सोमनाथ (गुजरात, सौराष्ट्र)

सदियों पुराना यह ज्योतिर्लिंग सौराष्ट्र (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है। इस प्रसिद्ध मंदिर को अब तक छह बार ध्वस्त एवं निर्मित किया जा चुका है। 1022 ई. में इसकी समृद्धि को महमूद गजनवी के हमले से सर्वाधिक नुकसान पहुंचा था। फिर कई बार यह मंदिर लुटेरों और आतंकियों का शिकार बना, लेकिन हर बार शिव भक्तों द्वारा और शिव महिमा के कारण अपने अस्तित्व में आता रहा। श्री सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कन्दपुराणादि में विस्तार से बताई गई है। श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का आविर्भाव दक्ष प्रजापति और चन्द्र देवता के साथ जुड़ा है।

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दक्ष प्रजापति ने अपनी अश्विनी आदि सत्ताइस कन्याओं का विवाह चंद्र देवता के साथ कर दिया, पर चंद्र देवता को अपनी सत्ताइस पत्नियों में से रोहणी अधिक प्रिय थी। इसी भेदभाव के कारण उनकी शेष पत्नियां बहुत दुखी हुईं। वे सभी अपने पिता दक्ष की शरण में गईं और उनसे अपना कष्ट बताया। चंद्रमा ने जब दक्ष की अवहेलना की तब दक्ष ने चंद्रमा को शाप दे दिया। और चंद्रमा को क्षय रोग हो गया। ब्रह्म के आदेश पर चंद्रमा ने प्रभास क्षेत्र में शिव की उपासना की और फलस्वरूप रोग मुक्त हुए। इस शिवलिंग की पूजा से क्षय तथा कोढ़ आदि रोग सर्वथा के लिए समाप्त हो जाते हैं। चंद्र के द्वारा पूजित होने के कारण इसे सोमनाथ कहते हैं।

2. मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश, कुर्नूल)

मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश, कुर्नूल)

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर दक्षिण का कैलाश कहे जाने वाले श्रीशैल पर्वत पर स्थित है। महाभारत, शिवपुराण तथा पद्मपुराण आदि धर्मग्रंथों में इसकी महिमा और महत्ता का विस्तार से वर्णन किया गया है। श्री मल्लिकार्जुन की कथा कुछ इस प्रकार है कि शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय और गणेश में पहले किसका विवाह होगा, इस पर कलह होने लगी। शर्त यह रखी गई कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, उसी का विवाह पहले होगा।

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बुद्धि के सागर श्री गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा कर पृथ्वी की परिक्रमा का फल प्राप्त किया। जब कार्तिकेय परिक्रमा कर वापस लौटे तब देवर्षि नारद ने उन्हें सारा वृतांत सुनाया और कुमार कार्तिकेय ने क्रोध के कारण हिमालय छोड़ दिया और क्रौंच पर्वत पर रहने लगे। कोमल हृदय से युक्त माता-पिता पुत्र स्नेह में क्रौंच पर्वत पहुंच गए। कार्तिकेय को क्रौंच पर्वत पर जब अपने माता-पिता के आने की सूचना मिली तो वह उस स्थान से तीन योजन दूर चले गए। कार्तिकेय के क्रौंच पर्वत पर से चले जाने पर ज्योतिर्लिंग के रूप में शिव-पार्वती प्रकट हुए। तभी से वे मल्लिकार्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुए। मल्लिका अर्थात पार्वती और अर्जुन अर्थात शिव। इस ज्योतिर्लिंग की पूजा से अवश्मेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। आदि शंकराचार्य ने शिवानंद लहरी की रचना यहीं की थी।

3. महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश, उज्जैन)

महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश, उज्जैन)

भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के उज्जैन में पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट के निकट भगवान शिव महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। देशभर के बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का अपना एक अलग महत्व है। कहा जाता है कि जो महाकाल का भक्त है, उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे। श्री महाकालेश्वर की कथा इस प्रकार है कि अवंति नामक नगरी में शुभ कर्मपरायण तथा सदा वेदों के स्वाध्याय में लगे रहने वाला एक वेदप्रिय नामक ब्राह्मण रहता था। जिसके चार संस्कारी पुत्र थे। उन दिनों रत्नमाला पर्वत पर दूषण नामक एक असुर ने धर्मविरोधी कार्य आरंभ कर रखा था। सबको नष्ट कर देने के बाद उस असुर ने अवंति (उज्जैन) पर भारी सेना लेकर चढ़ाई कर दी।

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अवंति नगर के निवासी जब उस संकट में घबराने लगे, तब वेदप्रिय के चारों पुत्रों के साथ सभी नगरवासी शिवजी के पूजन में तल्लीन हो गए। दूषण ने ध्यानमग्न नगर वासियों को मारने का आदेश दिया। तब भी वेदप्रिय के पुत्रों ने नगर वासियों को शिव के ध्यान में मग्न रहने को कहा। दूषण ने देखा कि यह डरने वाले नहीं हैं तो इन्हें मार ही दिया जाए और जब वह आगे बढ़ा, त्योंहि शिव भक्तों द्वारा पूजित उस पार्थिवलिंग से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हुए और दुष्ट असुरों का नाश कर यहीं महाकाल के रूप में विख्यात हुए। शिव ने अपने हुंकार से दैत्यों को भस्म कर उनकी राख को अपने शरीर पर लगाया। तभी से इस मंदिर में महाकाल को भस्म लगाई जाती है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि मंदिर के गर्भगृह में निकास का द्वार दक्षिण दिशा की ओर है। जो तांत्रिक पीठ के रूप में इसे स्थापित करता है।

4. ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश, नर्मदा नदी में एक द्वीप पर)

ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश, नर्मदा नदी में एक द्वीप पर)

कहा जाता है कि वराह कल्प में जब सारी पृथ्वी जल में मग्न हो गई थी तो उस वक्त भी मार्केंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता था। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर में है। ओंकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। शास्त्र मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के भले ही सारे तीर्थ कर ले, किन्तु जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहां नहीं चढ़ाता, उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं।

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ओंकारेश्वर के साथ ही अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग भी है। इन दोनों शिवलिंगों की गणना एक ही ज्योतिर्लिंग में की गई है। देवताओं और ऋषियों ने शिव से प्रार्थना की थी कि वे विंध्य क्षेत्र में स्थिर होकर निवास करें। शिवजी ने बात मान ली। वहां स्थित एक ही ओंकारलिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। प्रणव के अंतर्गत जो सदाशिव विद्यमान हुए, उन्हें ओंकार नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार पार्थिवमूर्ति में जो ज्योति प्रतिष्ठित हुई थी, उसे ही परमेश्वर अथवा अमलेश्वर लिंग कहते हैं।

5. वैद्यनाथ (झारखंड, देवघर)

वैद्यनाथ (झारखंड, देवघर)

शिवपुराण में वैद्यनाथ चिताभूमौ ऐसा पाठ है, इसके अनुसार (झारखंड) राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में जसीडीह स्टेशन के पास देवघर (वैद्यनाथ धाम) नामक स्थान पर श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से देवघर स्थित श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को ही प्रमाणिक मान्यता है। हर साल लाखों श्रद्धालु सावन के माह में सुलतानगंज से गंगाजल लाकर यहां चढ़ाते हैं।

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श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग राक्षस राज रावण द्वारा स्थापित है। यहां माता सती का हृदय गिरा था। इसी कारण इसे मनोकामना ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार विश्व विजयी बनने के लिए रावण शिव का स्वरूप ज्योतिर्लिंग लंका लेकर आ रहा था, तब दैवी इच्छा के अनुसार शिवलिंग रास्ते में ही रख दिया गया और तभी से यह देव स्थान भक्तों की आस्था का केंद्र है।

6. भीमाशंकर (महाराष्ट्र, भीमाशंकर)

भीमाशंकर (महाराष्ट्र, भीमाशंकर)

शिव का छठा ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर है। इसके मंदिर को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग असम राज्य के कामरूप जिले में स्थित शिवलिंग को भीमाशंकर मानते हैं, तो कुछ लोग महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले में स्थित भीमाशंकर के मंदिर को सही मानते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि उत्तरांचल राज्य के उधमसिंह नगर जिले में स्थित उज्जनक नामक स्थान में स्थित शिव मंदिर ही भीमाशंकर का मंदिर है। श्री भीमाशंकर की कथा इस प्रकार है कि पूर्व काल में भीम नामक एक महाबलशाली राक्षस था। वह राक्षस कुंभकर्ण और कर्कट की पुत्री कर्कटी से उत्पन्न हुआ था। उसने संकल्प लेकर ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने हेतु एक हजार वर्ष तक तप किया। उसकी तपस्या से लोकपितामह ब्रह्माजी प्रसन्न हो उठे। भीम को अतुलनीय बल प्रदान किया।

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ब्रह्मा के वरदान के कारण भीम ने इंद्र आदि सभी देवताओं को हरा दिया। यहां तक की श्रीहरि को भी परास्त कर दिया। विश्व विजयी अभियान में भीम ने शिव के परम भक्त सुदक्षिण को युद्ध में परास्त कर दिया। राजा सुदक्षिण को असुर भीम ने कारागार में डाल दिया। तब राजा ने शिव जी की उत्तम पार्थिव मूर्ति बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। देवताओं और ट्टषियों ने महाकोशी नदी के किनारे भगवान शिव की स्तुति की। तब शिव ने राक्षस का वध किया और तभी से भीमशंकर शिवलिंग विख्यात हुआ। अमूमन अधिकतर शिव भक्त महाराष्ट्र के भीमाशंकर के शिवलिंग को ही शिव का छठा ज्योतिर्लिंग मानते हैं। भीमाशंकर का यह मंदिर सह्याद्रि पर्वत पर है। मंदिर अत्यंत पुराना और कलात्मक है। मंदिर में स्थित मूर्ति से जल झरता है।

7. रामेश्वरम् (तमिलनाडु, रामेश्वरम)

रामेश्वरम् (तमिलनाडु, रामेश्वरम)

श्रीरामेश्वरम् तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनाड जिले में है। रामेश्वरम् की स्थापना के विषय में कहा जाता है कि श्रीराम ने जब रावण वध हेतु लंका पर चढ़ाई की थी, तब विजयश्री की प्राप्ति हेतु उन्होंने श्री रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। एक अन्य शास्त्रोक्त कथा भी प्रचलित है। रावण वध के बाद उन्हें ब्रह्म हत्या का पातक लगा था। उससे मुक्ति के लिए ट्टषियों ने ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि बुधवार के दिन शिवलिंग की स्थापना कर श्रीराम चंद्र को ब्रह्म हत्या के पातक से मुक्त कराया था। श्रीरामचंद्र द्वारा स्थापित होने के कारण यह शिवलिंग रामेश्वरम अर्थात राम के ईश्वर के नाम से जाना जाता है।

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8. नागेश्वर (गुजरात, दारुकावन, द्वारका)

नागेश्वर (गुजरात, दारुकावन, द्वारका)

श्रीनागेश्वर ज्योतिर्लिंग बड़ौदा क्षेत्र में गोमती द्वारका से ईशानकोण में बारह-तेरह मील की दूरी पर है। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गई है। श्री नागेश्वर शिवलिंग की स्थापना के संबंध में इस प्रकार की कथा है कि एक धर्मात्मा, सदाचारी और शिव जी का अनन्य वैश्य भक्त था, जिसका नाम सुप्रिय था। जब वह नौका पर सवार होकर समुद्र मार्ग से कहीं जा रहा था, उस समय दारूक नामक एक भंयकर राक्षस ने उसकी नौका पर आक्रमण कर सुप्रिय सहित सभी को बंदी बना लिया। पर सुप्रिय ने बंदी गृह में भी शिव भक्ति नहीं छोड़ी और भगवान शिव वहां ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए और सुप्रिय को अपना एक पाशुपतास्त्र दिया और अन्तध्र्यान हो गए। उस अस्त्र से सुप्रिय वैश्य ने राक्षसों का अंत किया और अंत में वह शिवलोक को प्राप्त हुआ।

9. काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश, वाराणसी)

काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश, वाराणसी)

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वाराणसी (उत्तर प्रदेश) स्थित काशी के श्रीविश्वनाथजी सबसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। गंगा तट स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग का दर्शन हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र है। काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान रूद्र मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। यह शिवलिंग सबसे पुराने शिवलिंगों में से एक है। काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या आदि से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहां निराकार परब्रह्म परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात् प्रकट हुए।

10. त्रयम्बकेश्वर (महाराष्ट्र, त्रयम्बकेश्वर नासिक के निकट)

त्रयम्बकेश्वर (महाराष्ट्र, त्रयम्बकेश्वर नासिक के निकट)

श्री त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में पंचवटी से 18 मील की दूरी पर ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे है। इस स्थान पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम भी है। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला एवं समस्त कष्ट को हरने वाला है। कहा जाता है कि त्रयम्बकेश्वर में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप में लिंग समाहित है। एक बार गौतम ऋषि पर षड्यंत्र कर अन्य ऋषियों ने उन्हें गोहत्या में फंसा दिया, तब ऋषि गौतम ने भगवान शिव का पार्थिव लिंग बना कर उपासना की थी। गौतम की तपस्या से शिव ज्योति रूप से प्रकट हुए और उन्हें पाप मुक्त किया।

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11. केदारनाथ (उत्तराखंड, केदारनाथ)

केदारनाथ (उत्तराखंड, केदारनाथ)

श्री केदारनाथ हिमालय की केदार नामक चोटी स्थित पर स्थित हैं। शिखर के पूर्व की ओर अलकनन्दा के तट पर श्री बदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिम में मन्दाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150 मील और ऋषिकेश से 132 मील दूर उत्तरांचल राज्य में है। पुराणों एवं शास्त्रों में श्रीकेदारेश्वर-ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन बारंबार किया गया है। यहां की प्राकृतिक शोभा देखते ही बनती है। इस चोटी के पश्चिम भाग में पुण्यमती मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदारेश्वर महादेव का मंदिर अपने स्वरूप से ही हमें धर्म और अध्यात्म की ओर बढ़ने का संदेश देता है। केदारनाथ मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने करवाया था। शिवलिंग के विषय में यह चर्चा आती है कि भगवान विष्णु के नर और नारायण नामक दो अवतार हुए हैं। उन्होंने पार्थिव शिवलिंग बनाकर श्रद्धा और भक्ति पूर्वक उसमें विराजने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की एवं शिव ने प्रसन्न होकर अपनी ज्योति यहां प्रदान की और यह शिव लिंग ज्योतिर्लिंग बन गया।

12. घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र, औरंगाबाद)

घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र, औरंगाबाद)

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श्रीघुश्मेश्वर (गिरीश्नेश्वर) ज्योतिर्लिंग को घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य में दौलताबाद से 12 मील दूर बेरुल गांव में स्थित है। द्वादश ज्योतिर्लिंगो में यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। इनका दर्शन लोक-परलोक दोनों के लिए अमोघ फलदाई है। श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार बताई गई है कि देवगिरि नामक पर्वत के समीप ब्रह्मवेता भारद्वाज कुल का ब्राह्मण सुधर्मा निवास करता था। सुधर्मा की कोई संतान न थी।

यद्यपि इसी कारण उनकी धर्मपत्नी सुदेहा बड़ी दुखी रहती थी। संतान प्राप्ति हेतु सुदेहा ने अपनी छोटी बहन घुश्मा के साथ अपने पति का दूसरा विवाह करवा दिया। सुधर्मा ने विवाह पूर्व अपनी पत्नी को बहुत समझाया था कि इस समय तो तुम अपनी बहन से प्यार कर रही हो, किंतु जब इसे पुत्र उत्पन्न होगा तो तुम इससे ईष्र्या करने लगोगी और ठीक वैसा ही हुआ। ईष्र्या में आकर सुदेहा ने घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी, पर घुश्मा विचलित नहीं हुई और शिव भक्ति में लीन हो गई। उसकी भावना से महादेव ने प्रसन्न होकर उसके पुत्र को जीवित कर दिया और घुश्मा द्वारा पूजित पार्थिव लिंग में सदा के लिए ज्योतिरूप में भगवान शिव विराजमान हुए और घुश्मा के नाम को अमर कर महादेव ने इस ज्योतिर्लिंग को घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा।

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